केंद्र ने राष्ट्रपति और राज्यपाल को फैसले लेने के लिए समय सीमा में बांधने का किया विरोध, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में ‘शक्तियों के बंटवारे’ का दिया हवाला

by Carbonmedia
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राष्ट्रपति और राज्यपाल को फैसला लेने के लिए समय सीमा में बांधने पर सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल किया है. राष्ट्रपति की तरफ से भेजे गए रेफरेंस पर 19 अगस्त से 5 जजों की बेंच सुनवाई करेगी. केंद्र ने अपने जवाब में संविधान में व्यवस्था के हर अंग के लिए किए गए शक्तियों के बंटवारे का उल्लेख किया है.
तमिलनाडु सरकार के 10 विधेयकों को दी थी मंजूरी 
इस साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के 2 जजों की बेंच ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास लंबित तमिलनाडु सरकार के 10 विधेयकों को अपनी तरफ से मंज़ूरी दे दी थी. कोर्ट ने राज्यपाल या राष्ट्रपति के फैसला लेने की समय सीमा भी तय कर दी थी. कोर्ट ने कहा था कि अगर तय समय में वह फैसला न लें तो राज्य सरकार कोर्ट आ सकती है.
राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को भेजे थे 14 सवालसुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले को लेकर राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को 14 सवाल भेजे थे. उन पर सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस बी आर गवई ने अपनी अध्यक्षता में 5 जजों की बेंच गठित की है, उसके बाकी सदस्य हैं- जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस ए एस चंदुरकर.
19 अगस्त से शुरू होगी सुनवाईसुनवाई 19 अगस्त को शुरू होगी. दोनों पक्षों को 4-4 दिन बोलने का मौका मिलेगा. 10 सितंबर को सुनवाई पूरी होगी. सुनवाई से पहले दाखिल 93 पन्नों के विस्तृत जवाब में केंद्र सरकार ने कहा है:-* संविधान ने व्यवस्था के हर अंग के लिए शक्तियों का बंटवारा किया है.* विधेयकों पर फैसला लेने का काम कार्यपालिका के प्रमुख करते हैं, लेकिन यह विधायिका से जुड़ा कार्य है. इस विशिष्ट प्रकृति के काम में न्यायपालिका का दखल गलत होगा.* संविधान निर्माताओं ने फैसला लेने की समय सीमा नहीं रखी.* अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को विशेष शक्ति दी गई है, लेकिन उसका इस्तेमाल कर सुप्रीम कोर्ट यह नहीं कह सकता कि राज्यपाल/राष्ट्रपति के पास लंबित विधेयक मंजूर माना जाए.* राज्यपाल को किसी मुकदमे में पक्ष नहीं बनाया जा सकता.* संवैधानिक महत्व के सवाल पर कम से कम 5 जजों की बेंच में सुनवाई का प्रावधान, 2 जजों की बेंच का आदेश देना गलत.* केंद्र और राज्य के विवाद की याचिका अनुच्छेद 131 के तहत दाखिल होती है. नागरिकों के लिए उपलब्ध अनुच्छेद 32 का इस्तेमाल कर राज्य याचिका दाखिल नहीं कर सकता.

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